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अनुवाद

( )Sugar these skin
                                               

राजनैतिक इतिहास

                                               

राष्ट्रीयता अनुसार नाटककार

                                               

भारत का राजनैतिक इतिहास

                                               

नेपाल का राजनैतिक इतिहास

                                               

न्यूजीलैंड की राजनीती

                                               

इंजील

इंजील इस्लामी शब्दावली के अनुसार ईसा के सुसमाचार को कहा जाता है। कुरान के अनुसार, इंजील अल्लाह द्वारा इंसानियत को दी गई चार पवित्र ग्रंथों में से एक है। जिनमें अन्य 3 हैं ज़बूर, तौरात और कुरान। मान्यता अनुसार ईसा को, जिन्हें नबी और इस्लाम का एक पैगंबर माना जाता है, अल्लाह ने इंजील का इल्हाम दिया था। कुरान, हदीस और अन्य तमाम पुराने इस्लामी दस्तावेजों में इस शब्द का प्रयोग एक किताब तथा ईश्वर द्वारा ईसा को प्रगट हुए तमाम इल्हाम का बोध कराने के लिए किया गया है।

                                               

नारायणखेड़

                                               

गेमबेटा

विठाबाई नारायणगावकर
                                               

विठाबाई नारायणगावकर

Vitae कलाकारों के परिवार में पैदा हुआ और पला-बढ़ा था. वह पर पैदा हुआ था पंढरपुर, सोलापुर जिला, महाराष्ट्र शहर में हुआ था. भाऊ-बापू मिलीग्राम नारायणन परिवार अपने पिता और चाचा द्वारा संचालित परिवार के चक्र था. अपने दादा नारायण से खुदी हुई मंडली की स्थापना की थी । वह कोड नाम,पुणे जिला, शिरूर तहसील के संबंधित निर्माण. बचपन से ही वह लेन, कर, किया, आदि । जैसे गीतों के विभिन्न रूपों के साथ संपर्क में थीं. एक छात्र के रूप में वह स्कूल में बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था, लेकिन वह बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के एक बहुत छोटी उम्र से ही मंच पर बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. उसके जीवन की उल्लेखनीय घटनाओं का वह काल था जब उसके बच्चे का जन्म हुआ था । वह अपनी कला के लिए 1957 में और 1990 में भारत के राष्ट्रपति से पदक, कि थे. उसमें यह लिखा है कि उनकी प्रसिद्धि और उनके द्वारा अर्जित सम्मान के बावजूद, किसी भी वित्तीय संकट में थे और उन्हें अनियंत्रित थे. उनकी मृत्यु के बाद उनके अस्पताल के बिल की दाताओं के योगदान मिले थे.

गोलोक
                                               

गोलोक

गोलोक भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान है। जहाँ पर भगवान कृष्ण अपनी प्रेमिका व आदिशक्ति स्वरूपा श्री राधा रानी संग निवास करते हैं। वैष्णव मत के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ही परंब्रह्म हैं और उनका निवास स्थान गोलोक धाम है, जोकि नित्य है, अर्थात सनातन है। इसी लोक को परमधाम कहा गया है। कई भगवद्भक्तों ने इस लोक की परिकल्पना की है। गर्ग संहिता व ब्रह्म संहिता मे इसका बड़ा ही सुंदर वर्णन हुआ है। बैकुंठ लोकों मे ये लोक सर्वश्रेष्ठ है, और इस लोक का स्वामित्व स्वयं भगवान श्री कृष्ण ही करते हैं। इस लोक मे भगवान अन्य गोपियों सहित निवास तो करते ही हैं, साथ ही नित्य रास इत्यादि क्रीड़ाएँ एवं महोत्सव निरंतर होते रहते हैं। इस लोक मे, भगवान कृष्ण तक पहुँचना ही हर मनुष्यात्मा का परंलक्ष्य माना जाता है। श्री ब्रह्म-संहिता मे कहा गया है: आनंदचिन्मयरसप्रतिभाविताभिस्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः। गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविंदमादिपुरुषम तमहं भजामि॥ अर्थात- जो सर्वात्मा होकर भी आनंदचिन्मयरसप्रतिभावित अपनी ही स्वरूपभूता उन प्रसिद्ध कलाओं गोप, गोपी एवं गौओं के साथ गोलोक मे ही निवास करते हैं, उन आदिपुरुष गोविंद की मै शरण ग्रहण करता हूँ। गोलोक धाम को वृन्दावन,साकेत, परंस्थान, सनातन आकाश, परंलोक, या वैकुंठ भी कहा जाता है। संसारिक मोह-माया से परे वह लोक अनिर्वचनीय है अर्थात उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती; उसकी परिकल्पना भी वही कर सकता है जिसके हृदय मे भगवद्भक्ति व प्रेम हो। इस धाम को ही प्रेम और भक्ति का धाम भी कहा जाता है। वह लोक स्वयं कृष्ण की भांति ही अनंत है। जिस प्रकार संसार को चलाने वाले तीनों गुणो- सतोगुण, रजोगुण, एवं तमोगुण से भी परे श्री कृष्ण है, उसी प्रकार यह धाम भी इन तीनों गुणो से परे है । भगवद्गीता में 15.6 भगवान श्री कृष्ण के धाम का वर्णन इस प्रकार हुआ है- न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ इसमे श्री कृष्ण कहतें हैं- "मेरा परमधाम न तो सूर्य या चंद्रमा द्वारा, न ही अग्नि या बिजली द्वारा प्रकाशित होता है। जो लोग वहाँ पहुँच जाते हैं वें इस भौतिक जगत मे फिर कभी नहीं लौटते।" यह श्लोक उस परम धाम का वर्णन करता है। हम यह जानते हैं की भौतिक जगत पृथ्वी लोक के आकाश मे प्रकाश का स्तोत्र सूर्य, चन्द्र, तारे इत्यादि ही हैं। किन्तु इस श्लोक मे भगवान बताते हैं कि नित्य आकाश मे किसी सूर्य, चन्द्र, अग्नि या बिजली कि कोई भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर से निकालने वाली ब्रह्मज्योति से प्रकाशित है। ब्रह्मसंहिता 5.37 मे भी इसका अति सुंदर वर्णन मिलता है- गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतः

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